देव इलाहाबाद में रहकर पढ़ाई कर रहा था।उसका 12वीं की परीक्षा चल रही थी, तभी अचानक उसकी तबीयत बहुत खराब हो जाती है। जैसे-तैसे करके वह परीक्षा निपटाया। परीक्षा से मुक्ति पाकर देव डॉक्टर के पास जाता है। वहाँ डॉक्टर ने उससे दो महीने रेस्ट के लिए बोला। वहा से आते ही तुरंत ट्रेन पकड़ देव घर को चला गया।
गांव में रहते-रहते बहुत बोर गया था। उसके दिमाग मे बस यही बात घूम रही थी कब तबीयत ठीक हो कि वह फिर इलाहाबाद को रवाना हो जाय।उसके पास एक टूटा-फूटा कीपैड वाला मोबाइल ही था उस समय टच स्क्रीन वाली एंड्राइड मोबाइल एका-दुका लोगो के पास वो भी मुश्किल से देखने को ही मिलती थी।
एक दिन उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया जिसमें लिखा था
हाय..
उसने सोचा यह किसका मैसेज है तो उसने भी हाय... लिखकर जवाब दिया।
उधर से कुछ जवाब नहीं आया, फिर देव ने कॉल किया तो कोई जवाब ही नहीं आया फिर देव ने सोचा कि हो सकता है गलती से मैसेज आ गया होगा
कुछ दिनों बाद फिर उसी नम्बर से उसी अंदाज में हाय ... का मैसेज आया।
देव ने देखा और फिर उसने भी रिप्लाई में हाय लिख कर भेज दिया। उसके बाद उधर से फिर मैसेज आता है "आप कौन बोल रहे हैं" देव ने प्रतिउत्तर में जवाब दिया- मैं देव और आप कौन??
उधर से जवाब आया- मैं स्नेहा..
देव ने पूछा - आप कहा से?
स्नेहा - नवाबों के शहर से और आप कहां से
देव- मैं संगम के शहर से…..
स्नेहा- अच्छा इलाहाबाद से हो... ओ बहुत बढ़िया जगह है
देव - बढ़िया जगह तो है यहां धर्म का संगम और पढ़ाई का कुम्भ लगा रहता है और आप तो लखनऊ से है वो भी तो अच्छा ही है
स्नेहा- हंसने की इमोजी के साथ जी हां! यहां सियासत के अखाड़े से लेकर पार्क (जनेश्वर मिश्र, राममनोहर लोहिया, The Residency) के गुच्छे तक सब के सब नवाबी ही है।
देव - अच्छा...आप को नम्बर कहां से मिला?
स्नेहा - कही से मिल ही गया है। अब ये भी जानना जरूरी है क्या?
देव - आपसे ज्यादा जरूरी तो नहीं है। वैसे बता देती तो अच्छा ही रहता।
स्नेहा- छोड़िए न जान कर क्या करेंगे। बस इतना बता रही हूं कि आप को मैं नहीं जानती और न किसी ने मुझे आपका नम्बर दिया है इसलिए आपको दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं है।
देव उसकी बात सुनकर सोच रहा था कोई उसका दोस्त तो ही नहीं न है जो उसके मजे ले रहा है लड़की बनकर सोचा बात कर लें पता तो चल जाएगा कि लड़का है या लड़की
देव उसके मोबाइल पर फोन घुमाता है मगर उधर से फोन काट दिया गया।
स्नेहा - आप काल क्यों कर रहे हैं।मैसेज से ही बात करिये न।
देव थोड़ा डर गया। उसे लगने लगा हो न हो दोस्त ही है इसलिए फोन नहीं उठा रहा है।
देव फिर मैसेज नहीं किया और उधर से भी मैसेज नहीं आया
देव को लगने लगा कि अब मैसेज नहीं आने वाला।
दो दिन बाद फिर मैसेज आया
स्नेहा - हाय...सुप्रभात
देव मैसेज देख चौंक गया फिर उसने मैसेज किया- सुप्रभात
स्नेहा - कैसे हो आप?
देव - एकदम मस्त..और आप?
स्नेहा - बहुत बढ़िया।
देव - आप क्या करती हैं?
स्नेहा - पढ़ाई (BA) लखनऊ विश्वविद्यालय से और आप?
देव - 12th का पेपर दिया है
स्नेहा- आप प्रॉपर इलाहाबाद से ही है या कमरा लेकर रहते और पढ़ते हैं।
देव - नहीं गाँव से ही हूं कमरा लेकर पढाई करता हूं और आप?
स्नेहा - मेरा भी गांव दूर है मैं हास्टल में रहकर पढती हूं ।
ऐसे ही देव और स्नेहा की कुछ दिनों तक बातें चलती रही और धीरे-धीरे उनके बीच दोस्ती हो गई। दोनों अपनी बातें आपस में शेयर करने लगे।
देव अभी भी असमंजस में था कि सच मे ही ये कोई लड़की है या कोई उसका दोस्त हैं जो मजे लेने के मकसद से मैसेज कर रहा है ।
मगर देव को स्नेहा से बात करके अच्छा लग रहा था क्योंकि पहली बार वह किसी लड़की से बात कर रहा था और उसे उत्सुकता होती कौन है जान लेने की क्योकि देव बहुत शर्मिला किस्म का लड़का था।लड़कीयों को देखते ही सर उसका नीचे हो जाता था अगर उसकी नजर किसी लड़की से कभी-कभार मिल भी जाती थी तो शर्म से उसका मुंह लाल हो जाता था येसा नहीं था कि वह नहीं चाहता वह किसी से बात न करें वह हमेशा चाहता था कि उसके दोस्तों की तरह उसकी भी एक प्रेमिका हो और खुब बाते हो मगर शर्मिला और डरपोक होने के कारण वह कभी भी अपनी बातों को रख नहीं पाता था इस वजह से कई बार आने वाले मौके उसके हाथों से निकल गए।
भाग-2
मगर स्नेहा से मैसेज पर बात हो रही थी इसलिए वो एक अलग ही लेवल के सुकून में जी रहा था।
वह खुद ही नहीं चाहता था कि बात करे मगर उसे कंफर्म तो करना था कि कौन?? मगर वह डर भी रहा था। सोच रहा था बार-बार काल करने पर स्नेहा नाराज न हो जाए इसलिए वह मैसेज से ही बात करने में ही अपनी भलाई समझा।
कुछ दिन बाद खुद ही स्नेहा ने ही काल कर दिया
तब देव हड़बड़ा गया जल्दी और जल्दीबाजी में काल कट कर दिया।
फिर स्नेहा ने मैसेज किया - आपने काल क्यों कट कर दिया पहले तो खुद ही बात करने के लिए काल कर रहे थे।
देव कुछ देर सोच कर मैसेज किया - ऐसी कोई बात नहीं है।अभी गांव पर हूं तो मां पास में ही है आपसे बाद में बात करते हैं।
स्नेहा - अच्छा ये बात है फिर ठीक है।
सच तो ये था देव अपने को बात करने के लिए तैयार कर रहा था अचानक काल देख कर उसके दिमाग का प्रोसेसर काम करना बंद कर दिया और समझ नहीं पाया कि क्या बात करे।
थोड़ी देर बाद खुद को तैयार करने के बाद फिर देव ने काल किया।
उधर से काल तुरंत रिसिव हुआ मानो उसी रिसीव वाले बटन पर ही अंगुली रखी हो।
काल तो रिसीव की आवाज नहीं आई देव मोबाइल को कान से लगा कर उधर से आवाज आने का इंतजार करता रहा कुछ देर सुना तब तक नेटवर्क ही चला गया।
क्या है कि उस समय नेटवर्क भी सही नहीं रहता था 1 रुपये पर मिनट काल दर भी चल रहा था उसने अपना बेलेंस चेक किया तो 2 रुपये बचे थे।
देव ने सोचा अब ऐसे जगह चलते हैं जहां सही ढंग से नेटवर्क हो नहीं तो बात भी नहीं हो पायेगी और मोबाइल का बैलेंस भी खत्म हो जाएगा।
उसके बाद उसने एक जगह ढूढी जहां नेटवर्क सही हो और फिर उसके बाद कॉल किया तो उधर से तुरंत ही कॉल रिसीव हुआ। इस बार भी उधर से आवाज नहीं आ रही थी।अब देव से रहा नहीं गया उसने बोला- हेलो.. अब बोल क्यों नहीं रही हैं तब थोड़ी देर बाद आवाज आई हां good morning कैसे हो?
देव स्नेहा की आवाज सुन कर मंत्रमुग्ध हो गया औऱ अपनी सुध-बुध खो गया। मन ही मन सोच रहा था कितनी सुरीली आवाज है तो देखने में कैसी होगी ?
सोचते हुए वह भूल ही गया कि उत्तर भी देना है
तभी उधर से स्नेहा बोली- अरे बोलिए क्या सोच रहे हैं।
देव बोला- हां मैं ठीक हूं आप कैसे हो ?
स्नेहा- हां मैं भी ठीक ही हूं और आप अभी कहां हैं ?
देव - अभी गांव ही हूं और आप?
स्नेहा- अभी तो हॉस्टल में हूं घर जा रही हैं।
और तभी देव ने कुछ बोलना चाहा तब तक फोन ही कट गया क्यों बैलेंस भी खत्म हो गया।
ऐसे करते-करते बातें बढ़ने लगी अब मैसेज और कभी कभार काल पर भी बात होती रही।
लेकिन एक दिन ऐसा हुआ कि न मैसेज आया और न ही काल आया। उसने सोचा कि कुछ हुआ होगा इसलिए काल लगाया तो स्विच आफ बता रहा था धीरे-धीरे एक - एक दिन बितते-बितते लगभग एक महीने हो गया और न काल और न ही मैसेज आया। देव परेशान होने लगा कि क्या हो गया वह रोज मैसेज करता। उधर से कोई जवाब नहीं आता और काल करने पर मोबाइल स्विच ऑफ बताता था।
कुछ दिन और कोशिश की फिर भी वही हाल था देव परेशान होकर काल करना ही बंद कर दिया वह समझ गया कि कोई उसका पागल बनाकर कर चली गई मगर देव का दिल मानने को तैयार नहीं हुआ कि कोई ऐसे कैसे कर सकते हैं हो भी क्यों न पहली बार किसी लड़की से दोस्ती हुई थी और बाती अच्छी हो रही है उसे अच्छा भी लग रहा था।
मगर अचानक ऐसा क्यों खुद के किस्मत कोसता रहा है उसके दिमाग में हमेशा यही कौंधता रहता है कि कम से कम बता देना चाहिए क्या हुआ क्यों नहीं बात करना चाहती !
दो महीने होने के थे फिर भी न फोन और न ही मैसेज.. देव समझ गया था अब कुछ नहीं होने वाला है देव मन ही मन सोचने लगा, जब बात करना ही नहीं तो मैसेज ही क्यों किया उसने सब लड़कियां ऐसी होती हैं क्या और भी बुरा भला ?
देव की गर्मीयों कि छुट्टी खत्म हो गई और वह अपने गांव से इलाहाबाद आ गया पढ़ाई में लग गया
स्नेहा से बात किए लगभग 3 महीने होने वाले थे देव तो अब भुल भी गया उसे काल भी करना है।
मन ही बस यही ख्याल आता रहा....
“क्यो आए थे जतन करने जब छोड़ ही जाना।
बिखरे ही सही थे हम क्या जरूरत थी सम्भल जाना।”
भाग-3
एक दिन देव पढ़ ही रहा था तभी एक मैसेज आया मगर वह ध्यान नहीं दिया। थोडी देर बाद काल आया तब उसने मोबाइल स्क्रीन देखा तो चौंक गया वह उसी स्नेहा का नम्बर था पहले तो वह उठाया नहीं मन ही सोचता अब क्यों काल कर रही है। तीन-चार बार काल आ गया फिर सोचा चलों पुछ लेते हैं इतने बाद क्यों याद आयी।
जब पांचवीं बार काल आयी तो देव ने काल रिसीव की और गुस्से में तमतमाते हुए बोला - अब क्या हो गया? अब क्यों काल कर रही हो इतने दिन कहा गायब हो गई??
इस तरह करके कई सवालों की देव ने झड़ी लगा दी। स्नेहा उधर बस सुनी जा रही थी उसको एहसास हो गया था की उसने बड़ी गलती की है कम से कम बता तो देना ही चाहिए था की क्यो नही काल की।
देव ने फिर पुछा अब क्या हो गया कुछ बोलोगी या फोन रखूं!
तभी धीरे से स्नेहा ने बोला - गुस्सा शांत हुआ कि और कुछ बोलना है और कुछ बोलना है तो बोल लो फिर हम बोलते हैं।
देव - बोलना क्या है? अब हमको तुमसे दोस्ती नहीं रखनी और न ही बात करनी है।
स्नेहा - पहले मेरी बात सुन लो। उसके बाद तुम्हारा जो मन करे वह करना नहीं दोस्ती करना मत करना ok मिस्टर।
देव - ठीक है बको।
स्नेहा - अरे यार मैं अपने मामा के यहां चली गई थी वहीं दो महीने रही इसलिए बात नहीं हो पाती।
देव - अरे कम से कम बता कर जाना चाहिए और नहीं तो वहां जाकर काल करना था ?
स्नेहा - मेरा मोबाइल मेरे बैग में छुट गया था और मुझे नम्बर याद नहीं था।
देव - तो घर पर किसी से काल करके मांग लेते नम्बर फिर काल करते
स्नेहा - क्या बताऊं तुमको मेरे पास मोबाइल है घर में किसी को नहीं मालूम मै उसे छुपा के रखती हूं और तुमसे बात करती थी तो घर वालों से कैसे बोलूं की नम्बर दो। सब लोग घर पर जान नही जाऐगे की इसके मेरे पास मोबाइल है।
देव को अब सारा माजरा समझ में आ जाता है फिर कुछ सोचने के बाद बोला- ठीक है मुझे तो मालूम ही नहीं था ये बात इसलिए आप पर गुस्सा कर रहा था। Sorry
स्नेहा - sorry आप क्यों बोल रहे हैं।sorry तो मुझे बोलना चाहिए क्योंकि मैंने ही आपको मामा के घर जाने से पहले बताया नहीं
मेरी तरफ से sorry....
देव - ठीक है अब Sorry कहने की जरूरत नहीं है।मुझे आपकी चिंता हो रही थी इसलिए मैं कई दिन काल किया मैसेज किया मुझे लगा क्या हो गया मोबाइल स्विच ऑफ बता रहा था इसलिए और टेंशन हो गया।
स्नेहा हंसते हुए बोली - अच्छा जी एक महीने बात क्या हुई आप तो हमारी चिंता करने लगे।
देव बोले तो बोले क्या फिर हंसते हुए बोला -ऐसा कुछ नहीं है अचानक कोई ऐसे करें तो थोड़ा बहुत चिंता होती है।
स्नेहा मजाकिया अंदाज में - अच्छा थोड़ा या बहुत जी।
देव - आप जो समझ ले।
इस तरह अब देव और स्नेहा की आपस में अब रोज रोज बाते होने लगी और टाइम के साथ दोस्ती और गहरी होती रही।
उस वक्त Uninor sim के unlimited मैसेज और काल करेज था और दोनों के पास Uninorका sim था इसलिए अब वह घंटों बातें करते रात हो या दिन जब खाली होते तब बाते करते।
देव और स्नेहा आपस में बात कर ही रहे थे तभी देव ने कहा- मुझे आपको देखना है।
स्नेहा - देख कर क्या करेंगे।
देव - इतने दिन से बात हो रही तो अगर देख लेते तो अच्छा होता हम भी जान जाते कौन है आप कैसी दिखती है आवाज तो बहुत अच्छी है।
स्नेहा मुस्कराते हुए - अरे हम देखने में सुंदर नहीं आप देख लेंगे तो बात नहीं करेंगे इसलिए ऐसे ही ठीक है
देव -ऐसा थोड़े ही है अब बात हो रही है तो होगी ही
स्नेहा - इतना कांफिडेंट
देव मुस्काते हुए पुछा - क्या आप फेसबुक चलाती हैं
(अभी उस वक्त फेसबुक का चलन हुआ ही था)
स्नेहा - मेरी मोबाइल में नेट नही चलता और न ही मैं फेसबुक चलाती हूं।
देव - फिर कैसे देखगे?
स्नेहा - अरे देखना जरूरी थोड़े ही है वैसे दूरी बहुत है देखने का कोई मतलब ही नहीं है।
देव - कुछ तो उपाय होगा।
स्नेहा देव की बात को काटते हुए बोली- कोई उपाय नहीं है आप ऐसे बात किजिए।
देव ने फिर नहीं बोला।
ऐसे ही उन दोनों की बातें होती रहीं। धीरे धीरे उन दोनों के रिश्ते और करीब होते गए।
भाग-4
देव का रूम पार्टनर (जो देव का जुनीयर था) जो सब समझ चुका था। वह देव के बहुत मज़े और चुटकी लेता और कहता भईया आप की तो लौटरी लग गई है और खुब हंसता आजकल लग रहा हमारी भाभी मिल गई है। आजकल खोये-खोये रह रहे थोड़ा हमारा भी ध्यान दिजिए।
देव - अरे ऐसा कुछ नहीं है।
पार्टनर बोला - वो तो हम देख ही रहे थोड़ा हमको भी फोटोईया दिखाईए न।
देव मन में सोच जब खुद देखे तब न दिखाएं
देव -अरे फोटो नहीं है।
एक दिन स्नेहा देव से बात करते हुए बोली - हमे आप से बात नहीं करनी।
देव हड़बड़ा कर बोला- क्यों! क्या हो गया! कोई दिक्कत हो गया क्या?
स्नेहा - नहीं ऐसा कोई दिक्कत नहीं मगर अब मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है।
देव - क्यों नहीं अच्छा लग रहा मैंने कुछ गलत बोल दिया क्या?
स्नेहा - नहीं ऐसा कुछ नहीं है क्या की रोज इतनी बातें हो रही है की मुझे आपकी बातों का लत लग गई है।अब डर लग रहा कहीं ये बातें और हो जाएगी तो दिक्कत हो जाएगा आप समझ रहे हैं न मैं क्या कहना चाहती हूं ।
देव समझ तो रहा था कि नजदीयां बढी तो दिक्कत तो होगी ही मगर अंजान बनते हुए बोला - अरे मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है और बात रही दिक्कत की तो क्या ही दिक्कत होगी हम लोगों के बीच इतनी दूरी, न ही हम देखे हैं आप को और न ही आप देखी हमको बस आवाज से ही तो जानते हैं एक दूसरे को जब तक चल रहा है तब तक चलने देते है और जब मन करेगा तब छोड़ दिजिएगा (देव आहे भरते हुए)
स्नेहा - इतना आसान है क्या जब छोड़ने का मन छोड कर चल दे।
देव- ठीक है जैसा आप ठीक समझें आपको लगता है कि बात न करने से ठीक हो जाएगा तो ठीक है मत बात किजिए।
स्नेहा - आप हमारी फिलिंग को समझ नहीं रहे हैं क्या सोच रही हूं और क्या समझाना चाह रही हूं।
देव इमोशनल होते हुए - ठीक है जो आप करना है किजिए हम जा रहे हैं नहाने मुझे कोचिंग जाना है।
यह मैसेज भेज कर देव नहाने चला गया और जब नहा कर आया तो देखा कि उसका रूम पार्टनर उसका मोबाइल लेकर कुछ कर रहा था
देव बोला क्या कर रहे मेरे मोबाइल से और हंस क्यो रहे हो
पार्टनर हंसकर बोला -कुछ नहीं आपका एक मैसेज आया
देव - किसका मैसेज?
पार्टनर - भाभी का और किसका।
देव - तुम सुधरोगे नहीं का चाहते हो रूम से भगा दे।
पार्टनर चुटकी लेते हुए - अब तो यही करेंगे ही भाभी जो मिल गई है हमको कौन पुछेगा।
देव - अरे भाई ऐसा कुछ नहीं है तुम जैसा सोच रहे हो वह बस दोस्त हैं
पार्टनर - अच्छा दोस्त है तो ऐसे कौन मैसेज करता है
देव सोचा यार मैंने तो सभी मैसेज डिलीट कर दिए थे तो फिर ये कुछ पढ लिया किया फिर मुस्काते हुए देव बोला - कैसा मैसेज
पार्टनर बोला- अब हम का सुनाएं कब आप ही पढ लिजिए ।
देव आया तो देखा मैसेज देखा उसमें लिखा था -I Love you ❤️
देव के तो होश ही उड़ गए और उसका पार्टनर हंसे जा रहा था और बोला भईया ठीक है न ये कैसा दोस्त हैं जो ऐसा लिख रहा है।
अब बताइए भाभी है या दोस्त..
देव - अरे कुछ नहीं बस ऐसे ही लिख दिया होगा
पार्टनर - भइया आप रिप्लाई तो दे दिजिए
देव - अरे नहीं छोड़ो हम बात कर लेंगे मोबाइल चार्ज में लगा दो थोड़ा चार्ज हो जाए अभी कोचिंग जाना है मैं थोड़ा खाना खा लूं।
देव खाना खाने लगा और सोचने लगा कि अरे ये कैसे हो गया वह मन ही खुश भी था और दंग भी था उसके साथ पहली बार ऐसा हुआ था उसे बहुत अच्छा महसूस हो वैसे पहला प्यार सबको ही प्यारा लगता है।
देव का पार्टनर थोड़ा चंचल टाइप का लड़का था। उसने देव के मोबाइल को चार्ज में लगाया और उसने खुद ही उसी मोबाइल में स्नेहा I Love you के रिप्लाई में I Love you लिख कर send कर दिया।
तभी उधर तुरंत call आने लगा अब उसका पार्टनर घबरा गया क्योंकि वह सोचा नहीं कि इतना जल्दी call आ जाएगा।
देव खाना खाते हुए बोला अरे किसका call है
पार्टनर - भाभी का।
देव - ठीक है बजने दो खाना खा कर बात करता हूं। उठाना मत।
पार्टनर - भईया एक चीज गड़बड़ हो गया हमसे।
देव - क्या हुआ ?
पार्टनर - जो आपको मैसेज आया था उसी के रिप्लाई मैंने दे दिया।
देव - क्या लिख के भेज दिए और देव दौड़ते हुए आया देखा तो रिप्लाई में इधर से I love you लिखा था।
देव - अरे तुमने ऐसे क्यों कर दिया अब मैं तुम्हें सच मे ही रूम से बाहर निकाल दूंगा अब तुम्हें साथ नहीं रखूंगा।
पार्टनर - sorry भईया ! मैं सोचा कि आप डर गए है इसलिए send कर दिया बस इस बार माफ कर दीजिये। अब जो हो गया वह हो गया। आप मना कर दिजीएगा और बता दिजिएगा की मैंने नहीं पार्टनर ने किया।
देव- हम बोले थे कुछ मत करना चलो ठीक है छोड़ो हम बाद में बात कर लेंगे मुझे पहले कोचिंग जाने दो और मोबाइल दो इधर।
देव मोबाइल लेकर कोचिंग निकल गया।
देव के मोबाइल पर कई बार फोन आया मगर वह कॉल रिसीव नहीं किया।सोच रहा था अब मैं क्या बोलूं.. सोचा चलो कोचिंग के बाद में कॉल करके बात कर लेंगे और मोबाइल साइलेंट करके पोकेट में रख ले।
देव क्लास में पहुंच तो गया मगर उसका मन बार-बार मोबाइल पर ही जा रहा था कैसे करके पूरी क्लास खत्म हुई और वह अपने रूम के तरफ निकल पड़ा जब मोबाइल देखा तो तब तक लोगों का 50 मिसकॉल पड़े थे फिर कॉल आया तो देव ने उसे रिसीव कर लिया मोबाइल को कान के पास लगाया उधर से स्नेहा की आवाज आ रही थी -अरे तुम कॉल क्यों नहीं उठा रहे हो।
देव -क्या बोलूं दूर रहकर यह प्यार वार संभव नहीं है और ना ही इसका कोई मतलब है जब तक दोस्ती है यार यही ठीक है।
स्नेहा - आप ही ने तो मेरे मैसेज का रिप्लाई किया था फिर अब क्या दिक्कत हो गई अगर ऐसा नहीं होता तो फिर रिप्लाई में I Love you क्यों लिखा।
देव - रिप्लाई मैंने नहीं किया था वह मेरे पार्टनर ने कर दिया था
स्नेहा - अच्छा मैं कैसे मान लूं कि उसने किया था तुमने उसको बताया है क्या।
देव - हां वह साथ में रहता है तो जानता ही है।
स्नेहा गुस्से में - अरे ऐसे कैसे हो सकता है कोई प्राइवेसी नाम की कोई चीज ही नहीं है दूसरे के मोबाइल से कोई दूसरा रिप्लाई कैसे कर देगा उसे डाटा नहीं।
देव स्नेहा के गुस्से को महसूस किया और शांत करने के लिए बोला - अरे उसको बहुत डांटा हूं वह माफी मांग रहा था।
स्नेहा - तो मेरे मैसेज का क्या रिप्लाई तुम बताओ.!
देव समय का मिजाज समझते हुए बोला- अब क्या बोले आप इतना गुस्सा हो रहे हो की मुझे हां ही बोलना पड़ेगा।
स्नेहा हंसते हुए - अच्छा जी अब हां हो गया हमारे गुस्से से इतना डर है क्या?
देव - डरना तो पड़ेगा ही।
स्नेहा - अच्छा फिर बोल दो।
देव - क्या?
स्नेहा - वहीं जो मैंने लिखा था उसका रिप्लाई बोलकर दे दो।
देव - मैं क्यों बोलूं आप ने भी लिख भेजा था आप ही बोल दो।
स्नेहा - कभी सुना की पहले लड़की प्रपोज करती हैं
देव - ये कौन से ग्रंथ में लिखा है कि लड़का ही बोलेगा।
स्नेहा - अच्छा फिर सुनो I Love you ❤️
देव मन ही मन गदगद हो गया और बोला - I Love you so much।
इस तरह देव और स्नेहा की दोस्ती प्यार में बदल गई।
बितता समय उन्हें और नजदीक ला रहा था
सम्बोधन में आप अब तुम हो गया था ये भी एक प्रेम की निशानी है।
एक दिन स्नेहा ने कहां - यार मुझे तुम्हें देखना है।
देव हंसते हुए - जब मैं बोल रहा था तब आप बोल रही थी कि बहुत दूरी है क्या करोगे देख कर। मैं देखने में अच्छी नहीं हूं।उसी तरह मैं भी बहुत खराब हूं,शक्ल अच्छी नहीं है देख कर क्या करोगी।
स्नेहा- सच कह रही हूं मजाक नहीं मुझे एक बार तो देखना ही है चाहे जैसे भी।
देव - अच्छा कैसे देखोगी कोई उपाय है, तुम तो फेसबुक भी नहीं चलाती।
स्नेहा- वहीं तो समझ नहीं आ रहा कैसे किया जाए तुम लखनऊ आओगे।
देव - नहीं यार मैं कभी लखनऊ गया नहीं हूं और न ही जानता कैसे जाना है पहली बार तो मैं घर से इलाहाबाद पढ़ने आया। वह भी ला कर पापा छोड़ गए मैं नहीं आ पाऊंगा अकेले।
स्नेहा- तो फिर क्या करें तुम ही बताओ मैं भी वहां तो नहीं आ पाऊंगी।
देव- तुम भी सोचो मैं सोचता हूं क्या किया जा सकता है।
दोनों कुछ दिन सोचते रहे क्या करें धीरे-धीरे हफ्ता बित गया।
भाग-5
देव एक दिन कोचिंग जा रहा था तो देखा की एक जगह गाना बज रहा था - "पहली पहली बार मोहब्बत की है कुछ न समझ में आए मैं क्या करूं "
देव को अच्छा लग रहा था क्योंकि उसके साथ भी पहली बार ही हो रहा था। अचानक उसके दिमाग में आया कि यह 'सिर्फ तुम' मुवी का गाना है उसमें तो लेटर भेजते हैं नायक और नायिका।
क्यो न मैं भी भेजूं ।एकबार मै यह बात स्नेहा को बताता हूं देव मन सोचता रहा।
देव ने स्नेहा को फोन कर बोला- यार एक उपाय है कहो तो बोले।
स्नेहा- हां बताओ।
देव- एनवलप में फोटो रख कर पोस्ट आफिस से भेज देते है और तुम अपना फ़ोटो भेज देना ठीक रहेगा न।
स्नेहा- अरे यार मैं घर आ गई हूं।अब मैंने हॉस्टल छोड़ दिया है,अब मैं यही घर से ही आती जाती हूं। लेटर के लिए मुझे घर का ही पता देना पड़ेगा और घर पर जब लेटर आएगा तो सब लोग जान जाएंगे। ऐसे कैसे हो पाएगा? पता नहीं मैं यहाँ रहूँ या न रहूँ ।बड़ी दिक्कत है। कोई और उपाय नहीं है?
देव - और कोई उपाय नहीं है बस मेरे पास एक ही उपाय है लेटर वाला कहो तो भेजें।
स्नेहा- मुझे डर लग रहा है, कोई जान न जाए। तुम देख लो बस किसी को पता नहीं चलना चाहिए।
देव - मेरे रूम का तो एड्रेस मिल जाएगा मुझे कोई दिक्कत नहीं होगा क्योंकि मेरे जो रूम मालिक हैं अंकल आंटी बहुत अच्छे हैं और एक फ्रेंड की तरह है।दिक्कत तुम्हारी है चलो मैं कुछ सोचता हूं और बताता हूं।
स्नेहा - अच्छा सोच कर बताना।
देव को तभी दिमाग में एक आइडिया आया और बोला- मैं तुम्हें एक डायरी भेजूंगा उसी में फोटो को कहीं छुपा कर रख दूंगा और मैं किसी लड़की के नाम से तुम्हें भेजूंगा अगर घर वालों को मिलेगा अभी तो बता देना कि वह मेरी सहेली मुझे भेजी है यह ठीक रहेगा।
स्नेहा- अरे कोई खोलकर उसे देख लिया तो?
देव- अरे मैं बहुत अच्छे से छुपा दूंगा कोई दिक्कत नहीं होगी।
स्नेहा - ठीक है तुमको जैसा लगे।
देव - पहले तुम भेजो फिर मैं भेजता हूं।
स्नेहा - नहीं पहले तुम भेजो फिर बाद में मैं भेजूंगी।
देव - ठीक है मैं ही पहले भेजता हूं।
देव उसके अगले दिन स्टेशनरी की दुकान पर गया और वहां से एक लिफाफा और एक अच्छी सी डायरी खरीद कर लाया।
देव ने डायरी के पीछे वाले गत्ते पर फोटो को रखकर फिर लास्ट के दो तीन पेज को उस पर अच्छे से चिपका दिया जिससे गत्ता और थोड़ा मोटा हो गया जिससे और किसी को पता ना चले कि उसमें फोटो है
देव ने खुद ही कई बार पूरी डायरी को इस तरह से चेक किया कि कहीं पता तो नहीं लग रहा है जब उसे कंफर्म हो गया कि अब किसी को पता नहीं चलेगा तो उसने उस डायरी को लिफाफा (एनवलप) में रखकर अच्छे से सटा दिया।अब उसके बाद क्या करना था उसे खुद ही मालूम नहीं था क्योंकि उसने कभी पत्र कहीं भेजा ही नहीं था सब चीज उसके साथ पहली बार ही हो रहा था।वह समझ नहीं पा रहा था क्या करें कैसे एड्रेस लिखें तो उसके बगल में एक भैया रहते थे उनके पास गया और पूछा- कोई पत्र भेजना होता है तो उसमें एड्रेस कैसे लिखते हैं तो उसके भैया ने बोले अरे कुछ नहीं है too लिखकर उसका एड्रेस डाल दो From कर अपना एड्रेस डाल दो ले जाकर पोस्ट ऑफिस में दे देना बस चला जाएगा।
बगल वाले भैया को तो मालूम नहीं था तो वह देव से पूछे तुम को भेजना है देव?
देव बोला- नहीं भैया एक मेरा दोस्त है उसको एक लेटर भेजना था कहीं वही हमसे पूछ रहा था इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूं।
भईया- ठीक है जाओ उसे बता देना जैसा मैं बताया हूं
देव- ठीक है भईया।
देव अपने रूम में गया और भैया के बताए अनुसार ही वह लिफाफे पर एड्रेस लिखा और बगल के पोस्ट ऑफिस में भेजने के लिए ले गया जब वह पोस्ट ऑफिस गया तो वहा अंकल बैठे थे बोले क्या भेजना है।
देव यह एक लिफाफा है इसे भेजना है।
पोस्ट ऑफिस वाले अंकल देव से बोले - बेटा यह यहां से जा नहीं पाएगा अगर लेटर होता तो यहां से चला जाता तुमको इसके मेन पोस्ट ऑफिस जाना होगा या मेन रेलवे स्टेशन के पोस्ट ऑफिस या कोरियर के द्वारा भेजना पड़ेगा।
देव- धन्यवाद अंकल जी मैं वहीं से भेज दूंगा
देव मन में सोच रहा था क्यों न कोरियर से ही भेज दे कौन मेन पोस्ट ऑफिस और रेलवे पोस्ट ऑफिस जाएगा वह कोचिंग जाएगा तब रास्ते में बहुत से कोरियर की दुकान मिलती है उसी से भेज देंगे।
देव अगले दिन कोचिंग जाते समय एक दुकान कोरियर की दुकान पर गया वहां देखा तो एक बुड्ढी औरत बैठी थी उनसे जाकर बोला एक समान है क्या यह चला जाएगा वह बोली क्यों नहीं चला जाएगा।
बुड्ढी औरत ने लिफाफे को देखा तो बोला बेटा इस पर वहां का मोबाइल नंबर भी लिख दो जिसको देना है
मैं भेजवा दूंगी।
देव ने उस पर स्नेहा का नम्बर लिखा और पुछा कब तक वहां पहुंच जाएगा
बुड्ढी औरत बोली 2-3 दिन में पहुंच जाएगा।
देव - ठीक है
देव ने पैसा दिया और वहा से चला गया
3 दिन बित जाने के बाद देव ने स्नेहा से पूछा - क्या डायरी पहुंच गई है कि नहीं
स्नेहा- अभी तो नहीं आई है अगर आती तो मैं बताती जरूर।
एक हफ्ते हो गए मगर जब डायरी नहीं पहूंची तो
देव फिर कोरियर वाले के पास गया तो उस दिन बुड्ढी औरत नहीं थी उसके बदले में उसका लड़का था तो बोला है कि सर आपका कुरियर वापस आ गया है आपने जो एड्रेस दिया था वह शहर से काफी दूर गांव में है इसलिए हम पहुंचा नहीं पाए और आपका नंबर भी नहीं लिखा था कि हम आपको कॉल करें आप इसे ले लीजिए ।
देव निराश हो गया लिफाफे को उठाया और फिर अपने रूम को चला गया।
जाते वक्त उसने स्नेहा को फोन किया और बोला - यार ये तो वापस आ गया है अब लग रहा मेन पोस्ट ऑफिस ही जाना पड़ेगा।
स्नेहा - अच्छा ये बात इसीलिए मैं भी सोच रही थी कि अब तक क्यों नहीं आया फिर मुझे डर भी लग रहा था पता नहीं किसके हाथ लग गया।चलो कोई नहीं फिर से भेज देना मेन पोस्ट ऑफिस जाकर।
देव - ठीक जा रहा हूं वही भेज कर तुम्हें फोन करता हूं।
स्नेहा - ठीक है ज्यादा परेशान मत कल ही भेज देना
देव- अभी भेज देते अब निकले हैं तो फिर कौन आएगा।
इतना बोल कर देव ने call को काटा और मेन पोस्ट ऑफिस चला गया
वहां जाकर उसने स्पीड पोस्ट कर दिया और रूम चला आया और स्नेह को बता दि की वह भेज दिया है। 3-4 दिन में पहुंच जाएगा देखते रहना।
उधर स्नेहा को बहुत उत्सुकता से उस लिफाफे का इंतजार था वह बस उसमें रखी फोटो देख लेना चाहती थी मगर 4 दिन हो गया गया नहीं आया तो देव से बोली तुम भेजे नहीं हो अगर भेजे होते तो अब तक तो आ ही जाता।
देव बोला - अब कैसे विश्वास दिलाएं की मैंने भेजा दिया मगर अभी नहीं गया तो मैं क्या करूं एक बार घर में पुछ लो किसी शायद आ ही गया होगा
या थोड़ा और इंतजार कर लोआ जायेगा।
भाग-6
1 हफ्ते होने को थे तब भी स्नेहा को वह लिफाफा नहीं मिला
तो वह अपने घर में मम्मी से पुछी की कुछ डाक से आया है क्या ?
उसकी मम्मी बोली नहीं तो ऐसा कुछ भी नहीं आया।
फिर वह अपने भाभी से पुछी तो उसके भाभी ने बोला हां एक डाक आया है
मेरे पास है आज ही आया है।
वह भाभी से लेकर अपने रूम में ले कर चली गई अब तो उसके खुशी का ठिकाना नहीं था मगर वह देखी कि लिफाफा खुला हुआ था तो उसे डर हो गया कि शायद कोई देख न लिया फोटो।
मगर देव ने ऐसे छुपा रखा था कि वह किसी को नहीं मिला खुद स्नेहा को ही नहीं मिल रहा था
तो उसने देव को फोन लगाया और बोली- एक खुशखबरी है तुम्हारी डायरी मिल गई है मगर इसमें तुम्हारी फोटो नहीं मिल रही है
देव - अच्छा बढ़िया है मिल गया तो वरना मुझे ही बोल रही थी की नहीं भेजा
स्नेहा - अच्छा छोड़ो वे सब बातें कहां रखे हो ये बताओ कैसे छुपा के रखे कि मुझे ही नहीं मिल रहा है।
देव हंसते हुए - ढूंढो कोई ले तो नहीं लिया
स्नेहा - यार मुझे नहीं मिल रहा भाभी ने पहले खोल कर देखा है शायद
देव - अच्छा डायरी के पिछे जो कवर है उसे खोलो वहां पर एक पेन से मार्क होगा वहां से हल्का कट मारो मिल जाएगा
स्नेहा - ठीक है मैं देखती हूं
इसके बाद स्नेहा ने फोन रख दिया
स्नेहा ने देव के बातने पर वेसे खोला तो सच में फोटो मिला फिर तो वह खुशी से उछल पड़ी उसे देव की फोटो बहुत पसंद आई वह यह रह कर फोटो को देखती और मुस्करा कर कभी कभी चुम लेती और शरमा जाती उसमें एक लेटर भी था जो देव ने लिखा था उसे पढ़ कर और उसमें खो गई वह उस वक्त को जी लेना चाहते थे और प्यार के अहसास को महसूस करना चाहती थी
फोटो को जी भर देख लेने के बाद फिर उसने देव को कॉल किया
स्नेहा - अरे यार तुम तो बड़े स्मार्ट हो मैं तो तुम्हारे आगे कुछ भी नहीं अब मैं तो तुम्हें अपनी फोटो नहीं भेजूंगी।
देव हंसते हुए - ऐसे नहीं चलेगा अब तो फोटो भेजना पड़ेगा ही नहीं तो अब हम बात नहीं करेंगे
स्नेहा - ठीक है चिंता नहीं करो कहा है तो भेजूंगी कल देखती हूं
देव - ठीक है
अगले दिन स्नेहा भी एक डायरी लाई और उसने भी देव की तरह फोटो को डायरी में रख कर भेज दिया।
स्नेहा ने देव को काल किया और बोला मैंने भेज दिया है
देव -अरे भेजने से पहले बताना चाहिए उस पता क्या डाले हो
स्नेहा - तुमने वह पता लिखा था उसी पर भेजा
देव - उसमें तो मैंने अपने पते पर एक लड़की का नाम लिखा था क्योंकि अपना नाम लिखता तो तुम्हारे घर वाले जान जाते मगर मुझे जब भेजना था तो मेरा नाम लिखना और सब सही है
स्नेहा - मैंने हुबहू वहीं पता लिख कर भेज दिया है उस तुम्हारे नाम के जगह अवंतिका लिखा है।
देव - चलों ठीक है अब तो भेज ही दिए तो क्या मगर भेजने से पहले बताना चाहिए था मैं अपने रूम मालकीन से बात कर लूंगा और बता दूंगा की अगर इस नाम से कुछ डाक आए तो मुझे देदे।
स्नेहा- ठीक है अब कर भी क्या सकते हैं।
इतने पर देव ने फोन काट कर रूम मालकीन के पास गया बोला - आंटी नमस्ते
आंटी देव को देखा और बोला - देव कैसे हो
देव - मैं बढ़िया हूं और आप?
आंटी (मजाकिया अंदाज में) - मै भी बढ़िया हूं मगर मुझे तुम आजकल अच्छे नहीं दिख रहे हो आजकल कहां खोए रहते हो जब देखो तब मोबाइल कान पर ही रहता लग रहा है कुछ प्यार व्यार का चक्कर है
और आंटी गाना गाने लगी ' थोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी'
आंटी (रूम मालकिन) एक विंदास महिला थी उनकी उम्र लगभग 65 साल होगी वह बहुत फ्रेंक महीला थी उनको देख कर लगता ही नहीं कि वह पुराने जमाने की वह आधुनिक लड़कियों तरह बात करती उनको गाना गाने का बहुत शौक था वह हमेशा गुनगुनाते रहती उनके पति जो सरकारी कालेज के प्रोफेसर थे वे पहले ही चल बसे तो उनकी पेंशन उनको मिलती थी उनके एक लड़का था जो लव मैरिज किया उसके बाद से ही वह अलग हो गया आंटी की बहू बहुत ही बदमाश थी वह उन्हें खाना बनाकर नहीं देती थी मगर मकान का आधा किराया वह और आंटी का लड़का लेता था कुछ हिस्सों का वह लेती और आधा कमरों का आंटी लेती थी। आंटी का लड़का भी बहुत हरामी था हमेशा आंटी जी झगड़ा करता आंटी जी के साथ उनका भाई रहता था जिसकी उम्र भी 50के करीब थी आंटी का भाई भी गाने का बहुत शौकीन था मगर वह दिमाग से पागल टाइप हो गया था इसलिए आंटी ने आप पास रखा था आंटी बताती थी उनका भाई एक बार गाना गाने के लिए मुंबई से ऑफर आया था तो उनका भाई ट्रेन में बैठ कर मुंबई जा रहा था तो कुछ लोगों ने उनके भाई को कुछ दवा खिलाकर बेहोश कर दिया और उसका सारा कागज पत्र और पैसा लेकर भाग गए तब से वह पागल जैसे रहने लगा नहीं तो पहले ठीक था
देव - अरे आंटी ऐसा कुछ नहीं है आप जैसा सोच रही है
आंटी - अरे बेटा मुझे सब मालूम है मैं सब की मन बात पढ़ लेती हूं कौन मुझे नहीं दिखाओगे
देव- आंटी जी मैं तो उसे देखा ही नहीं मगर देखा ही नहीं
आंटी - अरे बाबा तू कैसा लड़का है तुमने देखा नहीं बात करना शुरू कर दिया
देव - अब क्या करे।
आंटी - कोई बात नहीं जो भी है ठीक बात हो ही रही मिल भी लेना।
देव- आंटी की बात काटते हुए बोला आंटी एक काम था आपसे
आंटी - बोलों क्या बात है
देव - एक डाक आयेगा अवंतिका के नाम से आपको मिलेगा तो मुझे दे दिजिएगा
आंटी मुस्काते हुए बोली - ठीक है मैं तुम्हें दे दूंगी।
दो दिन बिता था कि देव का आंटी के लड़के से पानी को लेकर झगड़ा हो गया और देव को रूम छोड़ कर जाना पड़ा।
देव रूम छोड़ते वक्त आंटी को बोला अगर मेरा डाक आए तो मुझे काल कर दिजिएगा
आंटी बोली - तुम चिंता मत करों मेरे पास ही रहेगा आ कर ले जाना
देव ने आंटी को नमस्ते बोला और अपने नए रूम पर चला गया।
देव दो दिन बाद फिर गया आंटी से मिला पुछा मेरा डाक आया आंटी जी
आंटी - नहीं बेटा अभी तो नहीं आया आएगा तो बताऊंगी
देव चला गया
देव ने स्नेहा को काल किया पुछा 5 -6 दिन हो गया मगर अभी तक आया नहीं
स्नेहा - ठीक है कल जाती हूं पोस्ट ऑफिस में पुछती हूं
अगले दिन स्नेहा पोस्ट ऑफिस में गयी तो पता चला की वह 2 दिन पहले ही पहुंच चुका है
तब स्नेहा ने देव कहा -अरे पोस्ट ऑफिस मे पता किया तो वह बताया की दो दिन पहले ही पहुंच गया था कर फिर आंटी से पुछो
देव - ठीक है कल जाता हूं।
देव अगले दिन गया तो आंटी से पुछा कि डाक आ गया है क्या
आंटी -नही अभी तो नहीं आया है आता तो तुम्हें जरूर काल करती
देव - पोस्ट ऑफिस वाला बोला की पहूंच गया है
आंटी -अचछा रूको मैं अपनी बहू से पुछती हूं
आंटी अपने बहू को आवाज तो वह आयी बोली क्या हुआ देव
देव -भाभी एक डाक मिला है क्या
भाभी -हा मिला तो है 2 दिन पहले ही आया था मगर उस पर किसी लड़की का नाम था इसलिए मैं नहीं बोली मुझे लगा कि कोई गलती से इस पते पर भेज दिया है मैं तो तुम्हें कई बार यहां आते हुए देखें मुझे मालूम नहीं था कि तुम्हारा ही है रुको अभी लेकर आती हूं।
भाभी अंदर अपने रूम में गई और फिर वह लिफाफा लेकर देव को दे दी ।
इसके के बाद देव रूकने वाला कहा था उसके मन में तो प्रेम के लड्डू फुट रहे धड़कनें तेज चल रही थी खुशी के मारे दिल को चैन नहीं आ रहा था उसने तुरंत लिफाफे को बैग में डाला और साइकिल उठा कर तेजी से अपने रूम पर पहुंचा और तुरंत बैग खोला उसमें से लिफाफा निकाला जो पहले से ही खुला था शायद भाभी ने खोल कर चेक किया था।
उसने तुरंत फोटो निकाल लिया उसने तुरंत फोटो देखा तो देखता ही रह गया सुंदर सा चेहरा फिर माथे पर छोटी सी बिंदी आंखों में काजल सब समा बांध रहे थे कुछ देर बार उस फोटो को निहारता रहा।
फिर वह स्नेहा को फोन लगाया और बोला-क्या बात है इतना खूबसूरत हो यार तुम बोल रही थी कि हम अच्छे नहीं हैं बस मजे ले रही थी।
स्नेहा - तुम से तो कम ही अच्छे हैं
देव -ऐसा तो कुछ भी नहीं है तुम सच बहुत खुबसूरत हो
स्नेहा - अच्छा
देव और स्नेहा को बात करते हुए 7-8 महीने हो गए थे अब तो फोटो में एक दुसरे को देखने के बाद दोनों का इश्क और परवान चढ़ गया था।धीरे धीरे वक्त के साथ दोनों अपने प्रेम रूपी सत्संग में बह रहे थे। उसमें गा रहे थे और उसमें मस्तमगन हो गए
कुछ दिन बाद स्नेहा ने देव से बोला कि - मुझे तुमसे मिलने का मन हो रहा है।
देव - यार ये तो नहीं हो पाएगा तुम इतनी दूर हो की आना मुश्किल है
स्नेहा - कुछ करों न बस एकबार मिलना है मुझे
देव- मैं कभी इतना दूर गया नहीं हूं और मुझे मालूम भी नहीं की लखनऊ कितना दूर है और कितना टाइम लगेगा
स्नेहा - पता कर लो स्टेशन जा कर
देव - ठीक है पता करते हैं
देव मन में सोच रहा था इश्क़ में और क्या करना पड़ेगा बड़ा फजियत है वैसे भी देव का मन भी मिलने का बहुत मन हो रहा था मगर वह डर था कि कहीं यह लड़की बोला कर पिटवा न दे ।
देव ने अक्सर पेपर मे ऐसी इश्कबाजो को पिटाने की समाचार पढ़ा था और पहली बार इतना दूर जाने के बारे सोच कर घबरा रहा था क्योंकि उसके लिए लखनऊ उसके लिए अंजान जगह थी और अंजान रास्ता था।
वैसे भी उसे जब भी गांव से इलाहाबाद आना होता उसके पापा टिकट कटा कर पसेंजर ट्रेन में बैठा देते थे जिससे वह आसानी से आ जाता था मगर लखनऊ जाने के लिए उसे खुद ही सब करना पड़ेगा ट्रेन का पता लगाना कितने बजे है कैसे जाना है फिर कैसे आना है बहुत सारा दिक्कत था।
हिम्मत करके देव पहले स्टेशन गया वहां ट्रेन का पता किया तो उसे पता चला की एक ट्रेन 3 बजे सुबह, एक 6 बजे सुबह और सब शाम को है
देव को इलाहाबाद और लखनऊ के बीच की दूरी मालूम नहीं थी इसलिए उसे यह नहीं मालूम था कि कितना टाइम लगेगा उस टाइम आज की तरह इंटरनेट का प्रचलन ज्यादा नहीं था थोड़ा बहुत था मगर उसके के पास इस तरह का मोबाइल नहीं था जिससे वह पता कर सके
मगर देव ने सोचा कि क्यों ना 3:00 वाली ट्रेन से ही चला जाए फिर शाम तक वापस भी चले आएंगे।
न्यू ईयर आने वाला था देव ने स्नेहा से बोला कि मैं न्यू ईयर के दिन ही आऊंगा तुमसे मिलने के लिए रात को 3:00 बजे ट्रेन है सुबह 10~11 बजे तक पहुंच जाऊंगा फिर एक दो घंटा रहूंगा मिलकर फिर वापस तुरंत आ जाऊंगा।
स्नेहा-बढ़िया है आ जाओ मगर अभी तो न्यू ईयर आने में 10 दिन है
देव - तो क्या हुआ थोड़ा टाइम मिल जाएगा थोड़ा तर तैयारी करने के लिए
स्नेहा -अरे इसमें तर तैयारी क्या करना है बस तुम आ जाओ यही काफी है
देव - अरे मैं कभी इतना दूर गया नहीं हूं तो थोड़ा मुझे सोचने का भी वक्त मिलेगा मैं 1 जनवरी को ही आऊंगा
स्नेहा -ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी
दोनों मिलने के लिए बहुत बेताब थे सब अपने अपने तरीके से तैयारी कर लेना चाहते थे।
देव स्नेहा के लिए कुछ लेना चाहता तो वह कई गिफ्ट की दुकान पर घुमा मगर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लेना चाहिए।
संयोग से उस वक्त माघ मेला लगा हुआ था तो एक दिन वह अपने दोस्त के साथ माघ मेला गया और ढूंढते ढूंढते हैं उसके दोस्त को एक लॉकेट मिला जिसमें दिल बना था और वह खुलता था जिसमें फोटो लगा सकते थे उसके दोस्त वह पसंद आ गया वह बोला इसे मेरे कहने पर ले जाओ उसे पसंद आऐगा और देव बोला ठीक ये मुझे भी पसंद आ रहा है देव ने उसे खरीद लिया ।
फिर आगे बढ़ते बढ़ते उसे एक राधा कृष्ण की मूर्ति मिली जो बहुत ही खूबसूरत थी उसे भी उसने खरीद लिया और पैक करा लिया रूम पर चला आया रूम पर आने के बाद लॉकेट में एक तरफ अपनी फोटो लगा कर उसे भी रख लिया ।
31 दिसंबर का दिन आ गया उस दिन उसने इलाहाबाद का इलाहाबादी अमरुद जो फेमस था उससे भी खरीद कर बैग में रख लिया।
फिर देव सोचा और क्या लूं उसको अचानक ख्याल में आया क्यों ना खीर बनाया जाए तो वह शाम को ड्राई फूड और मखाना डालकर अच्छे से खीर बनाया और एक टिफिन में पैक किया उसे भी बैग में रख लिया।
रात को 12:00 बजे और नया साल आ गया तो देव नहीं स्नेहा को हैप्पी न्यू ईयर की बधाई दी और स्नेहा ने भी हैप्पी न्यू ईयर की बधाई दी उसके बाद स्नेहा ने बोला तो तुम आ रहे हो ना
देव- हां 3 बजे ट्रेन है
स्नेहा -ठीक है तुम थोड़ा सो लो फिर जल्दी से ट्रेन भी पकड़ना पड़ेगा
देव -नींद कहां आ रही है और कहीं सो गया तो फिर सुबह हो जाएगी इसलिए अभी सोऊंगा नहीं आराम से ट्रेन में जाकर सो लूंगा तुम आराम से सो जाओ।
स्नेहा - कोई नहीं मैं जगा दूंगी मैं भी जगी ही रहूंगी।
देव - नहीं अभी नहीं सोऊंगा यहां बहुत ठंडी पड़ रही पता नहीं रेलवे स्टेशन जाने के लिए ऑटो मिलेगा कि नहीं।
नहीं तो 5 किलोमीटर पैदल ही जाना पड़ेगा। मैं जल्दी निकलूंगा और जाकर स्टेशन पर ही बैठूंगा
स्नेहा - अच्छा ठीक है मैं भी तुम्हें कॉल करती रहूगी।
दोनों इतना बात करके फोन रख दिया।
देव तैयार होकर 1:00 बजे ही रेलवे स्टेशन के लिए निकल गया उसने आटो तो बहुत खोजा मगर नहीं मिला तो फिर पैदल ही जाने लगा रिक्शेवाले को बोला तो रिक्शावाला ₹100 मांग रहा था और वह पैसा देना नहीं चाह रहा था थोड़ा ज्यादा महंगा लग रहा था।
वैसे भी छात्र जीवन में इतना पैसा कहा ही रहता है बहुत सुझ बुझ से काम करना पड़ता है।
पैदल ही निकल गया ठंडी बहुत कड़ाके की थी चारों तरफ घना कोहरा था लगभग 45 मिनट के बाद देव पैदल ही रेलवे स्टेशन पहुंचा।
वहां पहुंचकर देखा कि ट्रेन 1 घंटे लेट है वह पूछताछ पर गया तो पता चला कि ट्रेन 4:00 बजे तक आएगी देव इंतजार करता रहा फिर अचानक अनाउंस हुआ कि ट्रेन 2 घंटे लेट हो गई है ट्रेन और धीरे-धीरे लेट होती जा रही थी।
अब देव को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें और उसे लखनऊ की दूरी का अंदाजा भी नहीं था।
उसने सोचा कि अगर हम 12:00 बजे पहुंचेंगे तो फिर तुरंत वापस भी कैसे आ पाएंगे तो उसने स्नेहा को कॉल किया
और कहा कि छोड़ो ट्रेन बहुत लेट है अब हम नहीं आएंगे आकर भी क्या करेंगे कि मिल ही नहीं पाएंगे 10 मिनट मिलने का कोई मतलब नहीं है तुरंत फिर भाग कर वापस ही आना पड़ेगा।
स्नेहा - कोई दुसरी ट्रेन देखलो उसी से आ जाओ
देव - 6:00 बजे ट्रेन है लेकिन उससे आने में कोई मतलब नहीं है तुरंत आऊंगा वहां पहुंचगा फिर तुरंत भागे भागे फिर वापस आना पड़ेगा मैं सोच रहा था कि 3:00 वाली पकड़ लूंगा तो 10~11 बजे तक लखनऊ पहुंच जाऊंगा फिर वापस 3~4 घंटे रह कर वापस आ जाऊंगा। मगर 6:00 बजे चलूंगा तो पता नहीं कितने बजे पहुंचेंगे कोई मतलब ही नहीं होगा वहां आने का।
स्नेहा देव की बात सुनकर रोने लगी और बोली- नहीं प्लीज आ जाओ अब आने के लिए निकल ही गए हो तो आ ही जाओ कैसे भी करके, आधा घंटा के लिए ही आ जाओ मगर आओ
देव- आधे घंटे के लिए आने का कोई मतलब ही नहीं है इतना दूर से जाना है फिर वापस तुरंत आना है अच्छा नहीं लगेगा इस से अच्छा है कि मैं रूम पर चला जाता हूं फिर कभी आ जाऊंगा दूसरे दिन।
स्नेहा - नहीं यार प्लीज़ आप जाओ तुम 6:00 वाली ट्रेन पकड़ो और आ जाओ
देव स्नेहा को मना नहीं कर पाया बोला - ठीक है कोशिश करता हूं!
भाग-7
देव ने पुछ ताछ वाले केंद्र पर गया और 6 बजे वाली ट्रेन के बारे में पता किया तो पता चला कि वह प्लेटफार्म नंबर 8 से 6बजे यही से चलेगी ।
तो देव दौड़ कर गया आठ नंबर प्लेटफार्म पर पहुंचा तो वो ट्रेन लगी हुई थी देव झट से उस ट्रेन में बैठ गया।
उसमें बैठे कई लोगों से पूछा कि यह लखनऊ कब तक पहुंचा देगी सभी ने बताया कि 10:30 बजे तक छोड़ देगी।
फिर देव ने अंकल से पूछा अंकल जी उधर से आने के लिए कितने बजे ट्रेन मिलती है
अंकल - अरे यही ट्रेन वापस आती 6 बजे लखनऊ से इलाहाबाद को आती है। तुम कहां जा रहे हो?
देव - लखनऊ ही जा रहा हूं
अंकल - वहां घर है क्या?
देव - नहीं घर नहीं है मेरा एक दोस्त है उसी के पास जाना है।
अंकल - किस जगह?
देव (सोचते हुए) - मुझे जगह की जानकारी नहीं है वह आयेगा लेने के लिए।
अंकल - फिर ठीक है अगर आना हो तो यही ट्रेन से वापस आ जाना ये भी वही से 6 बजे चलती है।
देव - ठीक है
6बज गए ट्रेन हार्न दे कर धीमी गति से ठीक अपने समय पर चल दी।
तब देव के जी में जान आया सोचा चलो ठीक है तो बहुत जल्दी पहुंचा देगी ये ट्रेन पहले मालूम होता तो इसी से आता रात को 12:00 बजे आने की कोई जरूरत ही नहीं थी देव अनुमान लगा रहा था कि अगर ये ट्रेन 11AM बजे भी छोड़ दे तों मेरे पास कम से कम स्नेहा के साथ 4-5 घंटे समय बिताने का मौका मिलेगा उधर से आराम से 6 pmबजे ट्रेन पकड़ भी लुंगा।
देव ट्रेन में बैठ गया था उसका दिल धक-धक कर रहा था क्योंकि किसी से अंजान से किसी अंजान शहर में मिलना उसे फिल्मी लग रहा था ऐसा लग रहा था मानो उसके आंखों के सामने कोई फिल्म चल रही हो। वह खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि वह ऐसा कर सकता है।
तभी इसी बीच चाय वाला चाय चाय चिल्लाते हुए आ रहा था तब देव का अचानक ध्यान टुटा और चाय वाले से बोला एक चाय दिजिए
चाय वाले ने चाय दी और चाय वाला चला गया
देव चाय के चुस्कियों के साथ खुद के इश्क को भी अपने रुह में उतार रहा था वैसे चाय तो अच्छी नहीं थी उसे इश्क़ में सब अच्छा लग रहा था
ट्रेन की खिड़कियों से पुरे रास्ते को वह निहारता हुआ चल रहा था मानो उसके सामने कोई नई दुल्हन बैठी हो। और वह अच्छे से उसे देख लेना चाहता हो। और ये हो भी क्यों न वह पहले प्यार में जो था सब चीजें उसके साथ नई थी।
तभी देव के मोबाइल पर घंटी बजी देखा तो स्नेहा का फोन था
देव ने स्नेहा के फोन रिसीव किया
उधर से स्नेहा बोली-अरे ट्रेन मिल गई
देव- हां मैं ट्रेन में बैठ गया हूं आ रहा हूं
स्नेहा हंसते हुए -वाह क्या बात है आओ जल्दी आओ!
देव - अच्छा मेरे लिए क्या ला रही हो कुछ खाने पीने के लिए ला रहे हो मैं कुछ खाया पिया नहीं हूं
स्नेहा- तुम उसका टेंशन मत लो मैं हूं ना तुम सिर्फ आ जाओ।
देव - हम तो आ ही रहे हैं कहीं हमको बुलाकर किसी से पिटवा तो नहीं दोगी न।
स्नेहा - इतना कहे डर रहे हो ऐसा कुछ भी नहीं है मैं तुमसे प्यार करती हूं और तुमको पिटवाने के लिए बुलाऊंगी पागल कहीं के।
देव- अरे मजाक कर रहा था मगर पता नहीं क्यों अंदर अंदर बहुत घबराहट हो रही है बहुत डर भी लग रहा है येसा फील हो रहा है जैसे कोई मूवी चल रही है
स्नेहा - घबराओ मत बस तुम आ जाओ हल्का-फुल्का तो डर हमें भी लग रहा है।
देव- ठीक है आता हूं
स्नेहा -ठीक है मैं काम करने जा रही हूं मुझे भी जल्दी आना होगा तैयार होके आने में एक डेढ़ घंटा तो लगेगा ही।
देव - ठीक है मगर तुम कहां आओगी मुझे लेने?
स्नेहा - रेलवे स्टेशन पर ही आ जाती हूं क्या है कि तुम तो देखे नहीं हो।
देव - यह ठीक रहेगा।
इसके बाद स्नेहा ने फोन कट किया और रेलवे स्टेशन आने के लिए तैयार होने चली गई।
इधर देव पहली बार लखनऊ के रास्ते में पड़ने वाले सभी चीजों को देखता हुआ जा रहा था।
वह मन ही मन सोच रहा था प्यार क्या क्या नहीं करा सकता उसको अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कभी वह ऐसा कर सकता है मिलने की उत्सुकता और धड़कनों की धक धक के साथ में वक्त के साथ बेचैनी बढ़ रही थी। उसे प्रेम की यह यात्रा रोमांचित कर रही थी।
उसके दिमाग बस यही चल रहा कैसे मिलूंगा और कैसे बात करूंगा पता नहीं बात कर भी पाऊंगा की नहीं क्योंकि मोबाइल पर बात करना और प्रत्यक्ष रूप से किसी से बात करना बड़ा कठीन था क्योंकि देव खुद ही शर्मीला था ठेठ भाषा में बोले तो लजकोकर टाइप।
जब आधा दूर पहुंचा ही था कि तभी स्नेहा का कोल आया है और पुछी कहा तक पहुंच गये
देव - शायद अभी रायबरेली आने वाला है और तुम कहां हो
स्नेहा - मैं भी निकल चुकी हूं बस अभी बस पकड़ी हू 1 घंटे लग जाएगा
और चाय पी लिये
देव - हां चाय तो पी ही लिया
स्नेहा - अभी भी डर लग रहा है क्या..!
देव- हां अभी भी डर तो लग ही रहा लेकिन अच्छा भी लग रहा है किस फिल्म के नायक के माफीक जैसे वह नायिका से मिलने जाता है।
स्नेहा ( हंसते हुए)- अच्छा डर भी लग रहा मजा भी आ रहा है दोनों फिलिंग का मजा ले रहे हो वैसे भी मुझे भी डर तो लग रहा है क्योंकि लखनऊ में मेरे बहुत से लोग काम के लिए जाते बस भगवान करे उनसे सामना न हो जाए वरना लोग घर आकर बता देंगे तो मुसीबत हो जायेगी
देव - तब तो बड़ा दिक्कत सच में कोई तुम्हारे पहचान के देख न ले।
स्नेहा - तुम चिंता मत करो ऐसा होने की बहुत कम ही सम्भावना है।
देव - अच्छा चलो अब तो आ ही रहे हैं तो देखेंगे क्या होता अब तो भगवान ही मालिक है।
स्नेहा - चलो ठीक है मैं स्टेशन पहुंच कर फ़ोन करती हूं।
देव - ठीक है
करीब 1 घंटे बाद ट्रेन में लोग अपना बैग इधर उधर कर रहे थे और कुछ उठ कर डिब्बे के दरवाजे के पास जाने लगे तो देव ने के एक लड़के से पुछा भाई कौन सा स्टेशन आने वाला है
लड़का बोला लखनऊ आने वाला है।
यह बात सुन कर देव भी अपना बैग लिया और दरवाजा के पास जा खड़ा हुआ।
5 मिनट बाद ट्रेन लखनऊ स्टेशन पा जा खड़ी हुई।
देव ट्रेन से उतर कर प्लेटफार्म नंबर 1 से बाहर निकाला मगर उसने देखा की रेलवे स्टेशन का नाम चारबाग लिखा था तो वह हड़बड़ा गया सोचा कहीं गलत स्टेशन पर उतर तो नहीं गया।
फिर वह बगल में एक खड़े आदमी से पूछा ये लखनऊ ही है न आदमी बोला हां ये लखनऊ ही है इसे चारबाग स्टेशन के नाम से भी जाना जाता है।तब जाकर देव को राहत मिली।
फिर देव ने स्नेहा को फोन किया और पुछा - कहां हो हम तो पहुंच गये है
स्नेहा -मै भी 5 मिनट में पहुंच ही जाऊंगी। तुम स्टेशन के बाहर आओ।
देव- मैं तो स्टेशन के बाहर ही खड़े है।
स्नेहा -अच्छा मैं तुम्हें जैसे बताती हूं तुम वहां पहुंचो।
देव - ठीक है बताओं
स्नेहा -तुम मैन रोड पर आओ जहां टैक्सी और बस चलती है उसके तुम्हें एक फुट ब्रीज दिखाई देगा।
देव अपने चारों देखा तो उसे फुट ब्रीज दिखाई दिया तो वह बोला हां मुझे दिखाई दे रहा है।
स्नेहा -फुट ब्रीज पर चढ कर सड़क के दुसरे तरफ आओ फोन रखना मत बात करते हुए
देव फुट ब्रीज पर चढ गया और फुटब्रिज के दूसरे तरफ पहुंचा तो बोला हलो कहां हो
स्नेहा- देखा वहां एक पेट्रोल पंप है वहीं खड़ी हूं तुम कहां हो
देव फुट ब्रीज से ही पेट्रोल पम्प की ओर देखा तो एक लड़की मोबाइल कान पर लगाए हूए खड़ी थी मुंह को दुपट्टे से बाध रखा था
देव बोला- हल्का नीला और गुलाबी का दुपट्टा पहने तुम हो क्या
स्नेहा- फुट ब्रीज पर देखते हुए हां मै हूं आओ मैंने तुम्हें पहचान लिया है।
देव फुट ब्रीज से उतर ही रहा था और उसके पाव कांपने लगे और जैसे जैसे वह स्नेहा की तरफ बढ रहा था वैसे वैसे उसकी धड़कनें तेज़ होती जा रही थी उसके शरीर का रक्त प्रवाह बुलेट ट्रेन की तरह बढ गया वह खुद खूब सहज और नार्मल कर रहा था मगर उसकी सारी कोशिशें नाकाम हो रही थी मुंह लाल हो गया था।
तब तक वह स्नेहा के सामने जा खड़ा हुआ अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि गले मिलना है या हाथ मिलाना या नमस्ते करना है चहेरा देखना तो दुर की बात थी अभी वह इसी कन्फ्यूजन में सोच ही रहा था।
तभी स्नेहा ने देव की तरफ अपना हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया मगर देव उसके हाथ को ही देखता रह गया फिर स्नेहा ने बोला क्या हुआ हुआ
देव ने हाथ जोड़कर नमस्ते कर बोला कुछ नहीं
तब स्नेहा अपना हाथ अपने तरफ खींचते हुए मुस्कराई और बोली- कहा चलना है
देव - आप जहां कहो
स्नेहा (हंसते हुए)- तुम से आप कैसे हो गए हम
देव मुस्काते हुए चुप ही रहा है
स्नेहा -मुझे भी यहां ज्यादा समझ नहीं आ रहा है तभी वह बोली चलो स्टेशन की तरफ ही चलते हैं
देव- ठीक है
दोनों साथ चलने लगे मगर घबराहट के मारे वह स्नेहा से तेज चल रहा था उसे डर लग रहा था कि कोई देख न ले। लड़की के साथ पहली बार चल रहा था तो उसे लग रहा था कोई कुछ कह न दे।
तभी स्नेहा - इतना तेज क्यों चल रहे हो मुझे लेकर नहीं चलना है।
देव पिछे मुड़कर देखा तो स्नेहा पीछे खडी होकर हंसी जा रही थी चेहरा तो दिख नहीं क्योंकि उसने दुपट्टे से मुंह बांधा हुआ था बोली इतना तेजी कहां जा रहे हो साथ चलो काहे इतना डर रहे हो डरना तो मुझे चाहिए।
देव - कहा चलना है जल्दी यहां से कहीं और चलते हैं मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है।
स्नेहा बोली हां मुझे भी स्टेशन पर जाना सही नहीं लग रहा है।
देव - तो फिर क्या करना है
स्नेहा थोड़ी देर सोचते हुए बोली मैं जहां कहूंगी वहां चलोगे
देव - हां क्यों नहीं वैसे भी मुझे यहां कहां कुछ मालूम है
स्नेहा बोली - चलो एक पार्क है वहां चलते हैं।
देव-कितना दूर है?
स्नेहा - यही लगभग 4से 5 किलोमीटर
देव मोबाइल में समय देखते हुए बोला- जहां चलना है वहां जल्दी चलो 12:30 pm हो गए हैं जल्दी ट्रेन पकड़ने के लिए आना भी पड़ेगा समय बहुत कम है
स्नेहा चलों वहां जाने के लिए आटो पकड़ना पड़ेगा
देव और स्नेहा आटो में बैठे और वह पार्क की तरह चल दिए
दोपहर का वक्त होन के कारण सड़क कर बहुत ट्रेफिक था कहीं जगह जाम लगा था 4km की दूरी तय करने में आटो वाले आधा घंटा लग गया और वे जाकर पार्क के गेट पर दोनों को छोड़ दिया
तब देव ने पैसा निकाल कर दे ही रहा था तभी स्नेहा बोली तुम मत दो मै देती हूं
देव - नहीं मै दे देता हूं किराया।
मगर स्नेहा नही मानी तुम मेरे शहर आएं हो तो मुझे देने दो
वह तुरंत अपने पर्स से पैसा निकाली दे दी।
दोनों पार्क के मेन गेट पर गए और टिकट लिया और पार्क के अंदर चले गए
पार्क के अंदर जाने के बाद यह जाकर देव को राहत मिला उसकी बैचेन धड़कनें थोड़ा शांत हुई
पार्क बहुत बड़ा था बहुत से पेड़ पोधै और पुराने जमाने की खंडहर घर थे मगर उनकी छत नहीं थी सिर्फ दिवार थी
देव थोड़ी दुर घुमने के बाद एक जगह बैठ गए
तभी स्नेहा ने अपना चेहरे से दुपट्टा हटाया तो देव कि तिरछी नजर उसके चेहरे पर गयी स्नेहा सच में बहुत सुंदर थी आंखें और उसकी मुस्कराहट देख वह फिर से दिल हार बैठा।
तभी अचानक देव की नजर स्नेहा की नजर से जा मिली देव शरमा गया
स्नेहा - क्या हुआ इतना शरमा क्यों रहे हो फोन पर तो बहुत बड़ी बातें करते हो अब मैं अच्छी नहीं लग रही हूं क्या।
देव - ऐसा कुछ नहीं है आप तो बहुत सुंदर हो।
स्नेहा - सुंदर होती तो तुम मेरे तरफ देखते यूं नजर चुरा कर नहीं बैठते।
देव - हिम्मत करके उसकी तरफ देखना चाहा मगर फिर शरमा गया ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि पहली बार किसी लड़की से वह इस तरह मिल रहा था बात कर रहा था।
स्नेहा इतने में देव के पास ठीक बगल में बैठ गई देव अचानक थोड़ा घिसक गया स्नेहा सच में यार बहुत लजा रहे रजाना तो मुझे चाहिए देख रही की तुम ही हमसे दूर भाग रहे हो बस पास में बैठी ही रही हूं कुछ कर तो रही नहीं
स्नेहा देव को अपनी बातों से सहज करने की कोशिश कर रही थी
स्नेहा- अच्छा तुम्हें तो बहुत भुख लगी होगी पहले दो ये पुड़ी सब्जी है इसे खा लो।
स्नेहा ने देव के सामने अपनी टिफीन खोल कर रख दिया तभी देव बोला हमारे बैग में खीर होगा उसे निकाल लेते हैं
स्नेहा (हंसते हुए)- हां निकालो वह मेरे लिए ही है ना
देव - हां
देव ने खीर डब्बा निकाल कर स्नेहा को दे दिया
स्नेहा - वाह क्या बात है बड़ा जबरदस्त बनाए हो
देव स्नेहा की बातें सुनकर मुस्कराता रहा
स्नेहा ने पुड़ी सब्जी के साथ खीर कै भी रख दिया और बोली तुम खाओ
देव- तुम भी खा लो
स्नेहा -नही तुम खा मैं का कर आई ही हूं।
देव - थोडा सा खा लो।
स्नेहा तो साथ में खाना ही चाहती थी मगर थोड़ा वह भी लजा ही रही थी
मगर वह देव के ज़िद के आगे कुछ न बोल सकी फिर दोनों ने खाना साथ में खाया।
भाग-8
खाना खाने के बाद दोनों एक दूसरे का हाल चाल पुछे और बीती बातों को याद करते हुए ठहाकों में हंसते रहे।
देव ने बैग में से राधा कृष्ण की मूर्ति निकाला और दिल वाला लाकेट भी निकला और स्नेहा को दे दिया।
स्नेहा देव का गिफ्ट पाकर फुले नहीं समा रही थी कृष्ण और राधा की मुर्ति देख कर बोली वाह कितनी सुन्दर है तभी दिल वाला लाकेट देखा तो बोला ये तो और भी बढीया है तुम्हारी पसंद तो लाजवाब है।
देव - ये लाकेट खुलता भी ।
स्नेहा ने खोल कर देखा तो उसमें देव की फोटो लगी थी दुसरे तरफ़ खाली थी।
स्नेहा बोली- इसमें एकतरफ मैं अपनी फोटो लगा दूंगी।
देव - हां
स्नेहा - जब ये लाएं हो तुम ही पहना दो।
देव ने स्नेहा के गले में पहना दिया।
स्नेहा ने खुब सारा मिठाई लेकर आई और उसने एक पर्स और एक चश्मा पैक करा कर देव को दे दिया था।
थोड़ा देर पार्क में घुमते रहे बात करते रहे बात है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी
तभी देव ने घड़ी देखा तो 4 बज गए थे देव बोला मुझे अब चलना चाहिए नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी अभी टिकट भी लेना है।
स्नेहा -अच्छा हां समय होने वाला है
स्नेहा ने देव का हाथ पकड़ लिया देव एकदम से सन रह गया है जैसे कोई करंट लग गया हो हाथ छुड़ा लिया मगर स्नेहा ने फिर पकड़ लिया।
इस बार देव ने भी हाथ नहीं छुड़ाया उसे भी अच्छा लग रहा था किसी लड़की का पहला स्पर्श जो मिला था।
हाथ पकड़े पकड़े पुरा पार्क घुमते रहे मगर पार्क खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था देव बोला कितना जल्दी समय खत्म हो गया न अब मुझे जाना चाहिए।
स्नेहा (मायूस होकर) - हां जाओ वरना तुम्हारी ट्रेन छूट जाएगी मै तो तुम्हें रोक भी नहीं सकती!
इतना कहकर देव के से लिपट कर रोने लगी।
देव अचानक से इस माहौल के लिए तैयार नहीं था उसने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा हगा वह एक मूर्ती की तरह खड़ा ही रह गया सांसें तेज चल रही थी मगर वह निर्जीव पड़ गया था।
उधर स्नेहा गले से लिपट कर रोये जा रही थी उसके आंसू देव के कंधों को भिगो रहे थे देव न खुद को सम्भाल पा रहा था न स्नेहा को।
खुद भी रो लेना चाहता तो था मगर आंखों के आंसू निकल नहीं पा रहे थे अंदर ही अंदर खुद के जज़्बात से लड़ रही थी।
थोड़ी देर बाद देव साहस करके स्नेहा को अपना रूमाल देते हुए बोला रोओ मत एक बार आ गया हूं तो आता ही रहूंगा चिंता मत करो।
स्नेहा बोली चलो मैं भी स्टेशन चलूंगी तुम्हें छोड़ कर फिर मैं चली आऊंगी।
देव - तुम परेशान मत हो मैं चला जाऊंगा तुम घर चली जाओ तुम स्टेशन जा कर क्यों परेशान होगी
मगर देव के कई बार कहने पर भी वह नहीं मानी वह उसके साथ स्टेशन तक चलने के लिए अपनी बात पर अड़ी रही।
दोनों ऑटो में बैठे और स्टेशन की तरफ चल दिए ऑटो में बैठी स्नेहा फिर भावुक हो गई और पूरे रास्ते भर रोती रही देव समझ नहीं पा रहा था क्या करें सभी लोग स्नेहा को देखे जा रहे थे देव बोला चुप हो जाओ सब देख रहें मगर उसके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
जैसे तैसे स्टेशन दोनों पहुंचे।
फिर देव बोला तुम जाओ मैं चला जाऊंगा।
स्नेहा देव को बाए की और चली गई जाते वक्त बार बार पीछे मुड़कर उसे देखती रही देव भी उसे देख रहा था जब तक वह ओझल नहीं हो गई। मगर उसके जाने के बाद देव भावुक हो गया आंखों से चुपके से आंसू निकल आए मानो स्नेहा के जाने का इंतजार ही हो देव आंसुओं को पोछते हुए टिकट काउंटर पर पहुंचा।
उसके बाद देव ने इलाहाबाद का टिकट लिया और ट्रेन में जाकर बैठ गया तब उसके अंदर से पूरा डर समाप्त हो गया और जी मे जान आई
उसकी घबराहटे अब शांत हो चुकी थी मिलने बाद जो देव चहेरे पर अलग तरह की रौनक थी पुरे रास्ते स्नेहा द्वारा दिए गए मिठाईयों से पेट पुजा करता रहा और कुछ बची तो लेजाकर दोस्तों में बाट दिया उसे ऐसा लगा हो जैसे किसी पर विजय प्राप्त कर ली हो।
मानो देव का दिल स्नेहा की तारीफों में कह रहा हो
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" हमने तुम्हारे तारीफो में बस लिखा है प्रेम।
सादगी की विरासत में ढला तन हो तो
सम्मोहन में क्या लिखूं..!
चांद, अम्बर, नदी या लिखूं रैन ।
काजल, बिंदी, झुमके और पायल से
तुमने तो लुटा ही है मेरे दिल का चैन ।
एकांत लवों पर मुझे दिखा है
तुम्हारे ढेर सारे बहकते जज्बातों का शोर ।
प्रीत के आंखों पर
कभी न चला है तुम्हारे पलकों को जोर।
जब बढाये है हमने हाथ
तुमने सहसा हमारे हाथों को थामा है।
तुम्हें धड़कनों की गहन समझ है
गले लगकर तुमने इसे शिद्दत से नापा है। "