रात का सन्नाटा है, और सड़क पर भारी कदमों से चलती एक लड़की।

उसके सर पर छत तो है, पर वो छत बोझ है...

एक पुराना, जर्जर मकान जो मोहल्ले की चकाचौंध में चीख-चीख कर अपनी मुफ़लिसी का ढिंढोरा पीटता है।

जहाँ गरीबी रूह तक को छलनी कर दे, वहाँ इज़्ज़त, सम्मान और सहूलियतें सिर्फ़ किताबों की बातें रह जाती हैं।

पड़ोस का एक और घर था, जो कभी इसी की तरह टूटा हुआ था।

पर आज वहाँ संगमरमर की दीवारें खड़ी हैं और कई मंज़िलें आसमान छू रही हैं।

फर्क? फर्क बस एक 'समझौते' का था।

एक ने अपनी गरिमा को ढाल बनाया, और दूसरी ने सीनियर मैनेजर के बिछाए बिस्तर को सीढ़ी।

दुनिया कहेगी— वो संगमरमर वाली लड़की गलत है।

दुनिया कहेगी— ये पैदल चलती लड़की ही सही है।

पर ये समाज कभी उस 'दरिंदे' को गलत नहीं कहेगा जो मजबूरी की खाल उतारता है।

कोई उस 'सिस्टम' पर उंगली नहीं उठाएगा जो चंद रुपयों के लिए इंसान को रेंगने पर मजबूर कर देता है।

कोई उस 'सरकार' से सवाल नहीं करेगा जिसने गरीबी को एक लाइलाज बीमारी बना रखा है।

ये गरीबी अनजानी नहीं है, ये तो 'बनाई' गई है।

ताकि सत्ता और रसूख के बाज़ारों में इंसानी जिस्म और जमीर सस्ते मिल सकें।

गलत वो लड़की नहीं जिसने खुद को बेचा,

गलत वो भी नहीं जो आज भी बोझ तले दबकर चल रही है।

गलत तो ये 'युग' है, ये 'दुनिया' है, और ये सड़ा हुआ 'तर्क' है—

जहाँ भूख का फायदा उठाने वाले को 'साहब' और भूखी लड़की को 'चरित्रहीन' कहा जाता है।

ये कलयुग नहीं, ये मजबूरियों की नुमाइश का दौर है।